Sunday, 22 August 2021

औकात

उदय शंकर अहलावत, एक रौबदार व्यक्तित्व। पूरे शहर में तूती बोलती थी उसकी। विशाल बंगला, कई गाड़ियां, नौकर चाकर। उस शहर में उससे धनी और रसूखदार कोई और था भी नहीं। वह उस शहर को अक्सर पिद्दियों का शहर कहता था। @Jitendra Rai "किसी की औकात नहीं यहाँ जो मुझसे नज़र मिलाकर बात कर सके। मिट्टी में रेंगने वाले कीड़े बसते हैं यहाँ, पिद्दी भर के।" आसमानों में घर था शायद उसका, जमीन पर देखता ही नहीं था। उसके पैसों और शोहरत के कदमों तले न जाने कितने ही रोज कुचले जाते थे, उसके क्रोध की तपन में न जाने कितने ही रोज झुलसते थे। सामने तो लोग डरते थे उससे, कुछ भी नहीं कह पाते थे, पर पीठ पीछे अक्सर लोग बातें करने लगते थे। " उदय शंकर अहलावत जी वास्तव में यू. एस. ए.( Uday Shankar Ahlawat: U.S.A.) ही हैं। अपने सामने किसी को कुछ भी नहीं समझते।" " भैया ऊ अमरीका ही हैं।" कुछ दिन पहले ही विदेश यात्रा से लौटा था वह। अभी वहाँ की बड़ी बड़ी बातों और शानों शौकत के कसीदे घर व शहर में पढ़ भी न पाया था कि अचानक पहले बुखार फिर खाँसी का दौर चलने लगा। सर फटने सा लगा। अपनी जगह पर खड़ा होना तक मुश्किल हो गया। हॉस्पिटल में एडमिट किया गया। सफ्ताह भर में ही अपार धन सम्पदा, शोहरत का स्वामी धाराशाई हो गया। एक पिद्दी भर के कीड़े की औकात ज्यादा बड़ी थी। @ Short stories by Jitendra Rai "Jeet"

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